May 10, 2026

उत्तराखंड सरकार मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ सांस्कृतिक और आधुनिक विषय भी पढ़ाएगी

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देहरादून। उत्तराखंड की धामी सरकार प्रदेश में अल्पसंख्यक शिक्षा के पूरे ढांचे को बदलने की तैयारी में है। मदरसा बोर्ड को भंग करने के बाद अब राज्य सरकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए बेहद सख्त नियम और एक नया 'अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण' लाने जा रही है। नई व्यवस्था के तहत अब केवल धार्मिक शिक्षा से काम नहीं चलेगा, बल्कि हर मदरसे और अल्पसंख्यक संस्थान को सरकारी पंजीकरण कराना होगा और सरकार द्वारा तय सिलेबस ही पढ़ाना होगा।

पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के विभिन्न मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं पाई गई थीं। जांच में सामने आया कि कई संस्थान बिना किसी मानक के चल रहे थे, कहीं कागजों पर छात्र संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई थी, तो कहीं सरकारी अनुदान (Grant) के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे थे। इन शिकायतों ने सरकार को मजबूर किया कि वह एक ऐसी व्यवस्था बनाए जहाँ पारदर्शिता और जवाबदेही तय हो सके। नई व्यवस्था का सबसे बड़ा और चर्चित हिस्सा 'धार्मिक शिक्षा का नया सिलेबस' है। विशेष सचिव (अल्पसंख्यक कल्याण) पराग मधुकर धकाते के अनुसार, धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ अब छात्रों को उत्तराखंड के इतिहास, यहाँ की समृद्ध संस्कृति और विरासत के बारे में भी पढ़ाया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र अपनी धार्मिक जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ मुख्यधारा की शिक्षा और प्रदेश की पहचान से भी जुड़ सकेंगे। इसमें आधुनिक विषयों (गणित, विज्ञान, कंप्यूटर) को भी प्रमुखता दी जाएगी। सरकार के इस फैसले से जहां पारदर्शिता आने की उम्मीद है, वहीं धरातल पर चुनौतियां भी कम नहीं हैं। दशकों से पारंपरिक ढांचे में चल रहे मदरसों के लिए अचानक नए नियमों और सरकारी सिलेबस को अपनाना आसान नहीं होगा। कई संगठनों ने इस पर आपत्तियां भी दर्ज कराई हैं। उनके अनुसार, यह धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थानों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप हो सकता है। हालांकि, विभाग का स्पष्ट कहना है कि बैठकों के जरिए सुझाव लिए जा रहे हैं, लेकिन नियमों को अंतिम रूप मिलने के बाद किसी भी तरह की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर आर्थिक ऑडिट तक, अब सब कुछ सरकार की निगरानी में होगा। धामी सरकार का दावा है कि उनका उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों को 'आधुनिक शिक्षा' से जोड़ना है ताकि वे केवल धार्मिक जानकार बनकर न रह जाएं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के क्षेत्र में भी आगे बढ़ें। नई व्यवस्था लागू होने के बाद सरकारी सहायता का सीधा लाभ पात्र छात्रों तक पहुंचेगा और 'फर्जीवाड़े' की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। अगले दो महीने उत्तराखंड की अल्पसंख्यक शिक्षा प्रणाली के लिए 'इम्तिहान' की घड़ी हैं। जून में शुरू होने वाली रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया यह तय करेगी कि राज्य के कितने संस्थान सरकार के इस नए विजन के साथ चलने को तैयार हैं। यह कदम न केवल शिक्षा का स्तर सुधारेगा, बल्कि संस्थानों की कार्यप्रणाली में एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव भी लाएगा।