देहरादून: उत्तराखंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और अनिश्चित मौसम के बीच खेती करना किसी चुनौती से कम नहीं है। कभी भारी ओलावृष्टि तो कभी भूस्खलन किसानों की मेहनत पर पानी फेर देते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की "मेरी पॉलिसी मेरे हाथ" योजना राज्य के अन्नदाताओं के लिए एक मजबूत ढाल बनकर उभरी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत संचालित यह अभियान अब किसानों को दफ्तरों के चक्कर काटने के बजाय, सीधे उनके घर की दहलीज पर सुरक्षा की गारंटी दे रहा है। 2022 से शुरू हुए इस विशेष अभियान का सबसे बड़ा लाभ इसकी 'डोरस्टेप डिलीवरी' व्यवस्था है। अब उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में रहने वाले किसानों को बीमा पॉलिसी के दस्तावेजों के लिए बैंक या सरकारी कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। बीमा कंपनी के प्रतिनिधि स्वयं किसान के घर जाकर उन्हें पॉलिसी के कागजात सौंपते हैं। इससे न केवल समय की बचत हो रही है, बल्कि प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता भी आई है। किसानों को अब अपने भूमि रिकॉर्ड, क्लेम (दावा) की प्रक्रिया और शिकायत निवारण के बारे में स्पष्ट जानकारी घर पर ही मिल जाती है।
उत्तराखंड के किसानों के लिए यह योजना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कवरेज का दायरा बहुत व्यापक है। सूखा, बाढ़, और ओलावृष्टि जैसी बड़ी आपदाओं के साथ-साथ स्थानीय जोखिम जैसे भूस्खलन (जो पहाड़ों में आम है) को भी इसमें कवर किया गया है। खरीफ और रबी की पारंपरिक फसलों के अलावा, पहाड़ की आर्थिकी की रीढ़ मानी जाने वाली बागवानी और वाणिज्यिक फसलों को भी इस बीमा सुरक्षा में शामिल किया गया है। फसल बर्बाद होने की स्थिति में बीमा राशि सीधे किसान के खाते में पहुंचती है, जिससे वे कर्ज के दुष्चक्र में फंसने से बच जाते हैं। तकनीकी रूप से भी यह योजना अब काफी उन्नत हो गई है। फसल के नुकसान का मूल्यांकन करने के लिए अब केवल मैन्युअल सर्वे पर निर्भरता नहीं है। विभाग अब ड्रोन और उपग्रह डेटा का उपयोग कर रहा है। इससे नुकसान का आकलन सटीक होता है और दावों का निपटान बहुत तेजी से किया जा रहा है, जिससे किसानों को समय पर आर्थिक मदद मिल सके। मेरी पॉलिसी मेरे हाथ" केवल एक दस्तावेज वितरण कार्यक्रम नहीं, बल्कि किसानों के बीच 'बीमा साक्षरता' बढ़ाने का एक बड़ा जरिया है। सरकार का मानना है कि जब किसान के हाथ में उसकी पॉलिसी होगी, तो उसे अपने अधिकारों का पता होगा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत मिल रही यह सुरक्षा उत्तराखंड के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें जोखिम मुक्त खेती की ओर ले जाने में मील का पत्थर साबित हो रही है।