govt-ads

धामी सरकार का बड़ा फैसला: उत्तराखंड में दोगुना होगी बुनकरों की संख्या, 25 हजार परिवारों को मिलेगा स्वरोजगार

Blog
 Image

देहरादून। उत्तराखंड के पारंपरिक शिल्प, हस्तकला और हथकरघा उद्योग को नया जीवन देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए धामी सरकार ने एक बड़ा रोडमैप तैयार किया है। राज्य सरकार ने आगामी दो वर्षों में प्रदेश में हथकरघा एवं हस्तशिल्प से जुड़े बुनकरों की संख्या को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है, जिससे कम से कम 25,000 स्थानीय बुनकर सीधे तौर पर स्वरोजगार से जुड़ सकेंगे।

पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को रोजगार का मजबूत माध्यम बनाने के लिए धामी सरकार ने नई तैयारी की है। प्रदेश में हथकरघा और हस्तशिल्प से जुड़े बुनकरों की संख्या अगले दो वर्षों में दोगुनी कर कम से कम 25 हजार लोगों को स्वरोजगार से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का जोर स्थानीय कला को प्रोत्साहित करने, पारंपरिक उत्पादों का उत्पादन बढ़ाने और बुनकरों को बाजार उपलब्ध कराने पर रहेगा। इसके लिए विशेष प्रोत्साहन योजना, अनुसूचित जाति उपयोजना और जनजातीय उपयोजना के संचालन में तेजी लाई जाएगी। अगस्त 2026 तक की हथकरघा जनगणना रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में वर्तमान में 12,561 बुनकर हथकरघा एवं हस्तशिल्प उत्पादों से जुड़े हैं। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग की योजना इस संख्या को बढ़ाकर अगले दो वर्षों में 25 हजार तक पहुंचाने की है। विभागीय स्तर पर इसके लिए योजनाओं को गति देने और उत्पादन से जुड़े लोगों को प्रोत्साहित करने की तैयारी की जा रही है। प्रदेश में पिथौरागढ़ जिले के धारचूला और मुनस्यारी, उत्तरकाशी के डुंडा और भटवाड़ी, ऊधमसिंह नगर के जसपुर, हरिद्वार के रुड़की तथा चमोली के माणा-घिघराण सहित विभिन्न क्षेत्रों में हथकरघा का काम होता है। वहीं, हस्तशिल्प गतिविधियां राज्य के सभी 13 जिलों में संचालित हैं। इन क्षेत्रों में पारंपरिक हुनर से जुड़े लोग स्थानीय संसाधनों और कला के आधार पर विभिन्न उत्पाद तैयार करते हैं।सरकार का मानना है कि इन गतिविधियों को बढ़ावा देने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। विशेष रूप से स्थानीय स्तर पर काम करने वाले कारीगरों को प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और बिक्री के बेहतर अवसर मिलने से उनकी आमदनी बढ़ाने में मदद मिल सकती है। प्रदेश में हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों की बिक्री हिमाद्री इम्पोरियम के माध्यम से की जाती है। देहरादून, उत्तरकाशी और नई दिल्ली सहित विभिन्न केंद्रों के जरिए उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके अलावा ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से भी बिक्री की जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वित्तीय वर्षों में हथकरघा एवं हस्तशिल्प उत्पादों की कुल बिक्री 1.57 करोड़ रुपये से अधिक रही। वर्ष 2023-24 में 81.21 लाख रुपये के उत्पाद बिके। हालांकि, इसके बाद के दो वित्तीय वर्षों में बिक्री का आंकड़ा प्रत्येक वर्ष 40 लाख रुपये से नीचे रहा। ऐसे में बुनकरों की संख्या बढ़ाने के साथ उत्पादों की बिक्री और बाजार का विस्तार करना भी विभाग के सामने महत्वपूर्ण चुनौती है। सरकार हथकरघा और हस्तशिल्प में दक्षता रखने वाले लोगों को उत्पादन तथा प्रशिक्षण से जोड़ने की योजना पर भी काम कर रही है। इसके लिए विभागीय स्तर पर जल्द प्रक्रिया शुरू किए जाने की तैयारी है। विद्यालयों में भी हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि पारंपरिक हुनर को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके। सरकार की योजना सफल होने पर अगले दो वर्षों में 25 हजार लोगों को हथकरघा एवं हस्तशिल्प गतिविधियों से जोड़ने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए केवल बुनकरों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। उत्पादों की मांग, उचित मूल्य, नियमित बिक्री और कारीगरों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि प्रोत्साहन योजनाओं और बाजार विस्तार के माध्यम से पारंपरिक हुनर को कितने प्रभावी ढंग से स्थायी स्वरोजगार में बदला जाता है।