देहरादून। बदलते मौसम, अनियमित बारिश, पानी की बढ़ती कमी और पहाड़ों से लगातार होते पलायन की मार झेल रहे उत्तराखंड के कृषि क्षेत्र के लिए एक बेहद उम्मीद जगाने वाली खबर है। राज्य में कृषि विविधीकरण और किसानों की आय बढ़ाने के लिए ग्राम्य विकास विभाग एक ऐतिहासिक शुरुआत करने जा रहा है। विभाग पहली बार उत्तराखंड में वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध 'सुपरफूड' किनोवा की खेती का एक बड़ा पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ एक ऐसी नकदी फसल का मजबूत विकल्प मिलेगा, जो बेहद कम पानी, कम लागत और न्यूनतम मेहनत में बंपर आमदनी देने में सक्षम है। विभाग ने गहन अध्ययन और व्यापक तैयारियों के बाद राज्य की करीब 100 एकड़ भूमि पर इस पायलट प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने का फैसला किया है। इसके लिए पौड़ी गढ़वाल जिले के थलीसैंण क्षेत्र का चयन किया गया है। वर्तमान में इस परियोजना को शुरू करने के लिए किनोवा के उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज विशेष रूप से बाहर से मंगाए गए हैं, जिनसे पहली फसल तैयार की जाएगी।
ग्राम्य विकास विभाग के सचिव धीरज गर्ब्याल ने इस संबंध में बताया, "उत्तराखंड में सरकारी स्तर पर किनोवा की खेती को बढ़ावा देने का यह पहला बड़ा प्रयास है। यदि थलीसैंण का यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो यह हमारे पर्वतीय किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का एक नया और प्रभावी माध्यम बनेगा। इसके बाद पहाड़ों में कृषि को फिर से एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में स्थापित किया जा सकेगा। मूल रूप से दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वतीय क्षेत्र (पेरू और बोलिविया) की पारंपरिक फसल किनोवा आज दुनिया भर में एक 'सुपरफूड' के रूप में विख्यात है। तकनीकी रूप से यह अनाज न होकर एक 'छद्म-अनाज' (Pseudo Cereal) है, लेकिन इसका उपयोग चावल, दलिया और आटे की तरह ही किया जाता है। यह फसल उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों के लिए बिल्कुल अनुकूल है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं। समुद्र तल से 1,000 से 3,500 मीटर की ऊंचाई पर इसकी खेती शानदार होती है, जो उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों का मानक है। जहां पारंपरिक फसलें अधिक सिंचाई मांगती हैं, वहीं किनोवा सूखे और कम पानी में भी बेहतरीन पैदावार देता है। इसमें पारंपरिक फसलों की तुलना में कीट और रोगों का प्रकोप न के बराबर होता है, जिससे किसानों का लागत खर्च घट जाता है। पहाड़ में पारंपरिक मंडुवा साल में एक ही बार होता है, जबकि अनुकूल मौसम में किनोवा की फसल साल में 2 से 3 बार तक ली जा सकती है। देश-विदेश के बड़े शहरों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों और मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों के बीच किनोवा की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि यह पूरी तरह ग्लूटेन-फ्री है और इसमें 14 से 16 प्रतिशत तक हाई-प्रोटीन के साथ सभी 9 आवश्यक अमीनो एसिड, फाइबर, आयरन और कैल्शियम पाए जाते हैं। वर्तमान में भारतीय बाजार में सामान्य किनोवा की थोक कीमत 80 से 150 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि ऑर्गेनिक और प्रीमियम क्वॉलिटी का किनोवा 200 से 300 रुपये प्रति किलोग्राम या उससे अधिक की कीमत पर आसानी से बिकता है। प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग के बाद इसका मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है। इससे पहले कुछ प्रगतिशील किसानों ने व्यक्तिगत स्तर पर किनोवा उगाने का प्रयास किया था, लेकिन तकनीकी मार्गदर्शन और बीजों की कमी आड़े आ गई थी। सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए प्रगतिशील किसान सुधीर सुंदरियाल कहते हैं, "अगर सरकार बीज, प्रशिक्षण और बाजार दे, तो यह पहाड़ों में कृषि की तस्वीर बदल देगा और युवाओं का रुझान खेती की तरफ फिर बढ़ेगा। विभाग की योजना है कि थलीसैंण में पहली फसल के सफल होते ही विभिन्न मिलेट्स की तर्ज पर उत्तराखंड में ही किनोवा का एक बड़ा 'सीड बैंक' विकसित किया जाएगा, ताकि भविष्य में किसानों को स्थानीय स्तर पर ही सस्ते और गुणवत्तापूर्ण बीज मिल सकें। सलाद, स्नैक्स, ब्रेड और बिस्कुट में इस्तेमाल होने वाले इस सुपरफूड के दम पर अब उत्तराखंड के किसानों के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के दरवाजे खुलने की उम्मीद जग गई है।

